Monday, 17 February 2014

कुछ ख्वाहिश

कुछ ख्वाहिश


आज कुछ ख्वाहिश  की तेरे पास आने की 
आज फिर दिल ने दूरियाँ बना ली
 
आज फिर मन ने चाहा कि तुझे ख़त लिखूँ 
आज फिर मन की सारी बातें हमने छुपा ली

आज फिर लबों ने चाहा कि तुझे गुनगुना लूँ 
आज फिर हमने सारी सरगम भुला दी

आज फिर आँखों ने चाहा कि तुझे ख्वाबों  में 
अपने बसा लूँ 
आज फिर हमने सारी  रात आँखों में गुज़ार दी
 
आज फिर हाँथों ने तेरा साथ माँगा 
आज फिर नए रास्तो को हमने अपनी चाहत बना ली 

आज फिर कदम चल पड़े तेरी तरफ 
आज फिर हमने नयी मंज़िलें बना ली
 
आज फिर दिल ने तुझे याद किया 
आज फिर हमने तुझे भुलाने की सारी कोशिशें भुला दी 
 
बस इतना ही कहना है तुमसे 
ओ मेरे हमसफ़र तेरी धड़कनो को हमने अपनी ज़िन्दगी बना ली  

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