Saturday, 10 October 2015

पहली मुलाक़ात...

उस दिन जब तुम पहली बार मिले
अधरों पे मुस्कान लिए
देखकर मुझे
कैसे तुमने दिल को थाम लिया था
और मुस्कुराकर
मन ही मन मेरा नाम लिया था

साथ जब चलने लगे हम तुम
हाथों में हाथ था और
फिर तुमने कसकर मुझको
आलिंगन में बाँध लिया था

पूरे दिन तुमने जाने कितनी बातें बोली
और सारी मन की गिरहें खोली
फिर भी जो नही कहा प्रिये
वो सब मैंने आँखों से जान लिया था

दिनभर यूँ ही बीत गया
पर शाम को जब विरह की घडी आई
आँसू न बह जाये कहीं आँखों से
ये सोचकर हमने दिल को थाम लिया था

उदास होकर जब मैं मुड़ी
अचानक पीछे से इक आहट आई
कानों में शहद सी घुल गयी थी
जब तेरे अधरों ने मेरा नाम लिया था

प्रेमपाश में बंधे हम दोनों
इक दुसरे से से कभी जुदा न होंगे
दो जिस्म इक जान बनकर रहेंगे
ऐसा हमने मान लिया था

ज़रूरी चीजें...

अक्सर बेहद ज़रूरी चीज़े
रख कर भूल जाती हूँ
इसलिए तो...
कहीं खो गये हैं...
बेबाकी जिन्दादिली और मुस्कान
बहुत ढूँढा पर नहीं मिले नहीं
ज़रूरी कागज़ अक्सर सिरहाने में डाल देती थी
वहाँ भी नहीं मिले
सब जगह खोज की
और देखो ना
ये जो गये तो उस खाली
जगह को भर दिया
झिझक,निराशा और उदासी ने
ऐसा होना तो नहीं था
और ऐसा होने भी नहीं दूँगी मैं
मेरी खोज अनवरत चल रही है
और एक दिन इन्हें खोज कर
रख दूंगी तिजोरी में
या सिरहाने में
की जब भी ज़रूरत हो
तुरंत मिल जाएँ।